February 23, 2024
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Ram mandir यह मूर्ति नहीं राम के मूल्यों की स्थापना है

लेख- डॉक्टर अनिल भदौरिया

क्षत्रिय धर्म- समाज में शुद्धता की स्थापना और रक्षा के धर्म पालन के लिए राजधर्म से हथियार उठाकर युद्ध की प्रस्तुत होने पड़े तो अपनी संतान को भी आगे भेजो. विश्वामित्र के आव्हान पर अयोध्या राजा दशरथ ने आपने अबोध और युवा बालकों राम-लक्ष्मण को 16 वर्ष की कम आयु में आश्रम सुरक्षा में असुर संहार के लिए गुरु विश्वामित्र को समर्पित कर दिया था.
आज्ञा पालन-शिष्य द्वारा गुरु की आज्ञा का पालन हर स्थिति में करते हुए ऋषि विश्वामित्र का कार्य समाप्त होने पर राजा जनक के द्वारा आयोजित स्वयंवर आयोजन में बिना माँ-पिता की सहमति के भी सम्मिलित हो, कार्य संपन्न कर देना. गुरु की आज्ञा का पालन अनुशासन की पहली सीढ़ी होने का द्योतक है.
नैतिक कर्तव्य पालन- रावण जैसे बाहुबली के समक्ष जटायु इतने समर्थ न थे परंतु परिणाम की चिंता ना करते हुए भी मां सीता के अपहरण को रोकने के नैतिक दायित्वों का पालन का भागीरथी प्रयास किया. गिद्धराज जटायु के लिए मां सीता अनजान नारी थी जिनमें सुरक्षा के लिए वह प्राण तक न्योछावर करने को उतारू हो गए थे. इस नैतिक कर्त्तव्य पालन के जैसा अन्य उदाहरण अनादिकाल से आज तक मिलना कठिन है.

सम-भाव- सरयू नदी पार करने में वनवासी राम ने जिन नाव खिवैया, केवट की सहायता ली उनके पक्ष में सदा मित्र के भाव का प्रदर्शन किया. राम के वनवास गमन में भारत के मिलने आने पर भी वनवासी राम ने केवट को आपने बराबर में बिठकर सम्मान दिया था. श्री राम का वनवास काल में हनुमान जी से जो मित्र भाव उत्पन्न हुआ जो हनुमान जी के मन में श्रीराम के प्रति सेवक भाव उत्पन्न होने के बाद भी स्थापित ही रहा है.यही मित्र भाव सुग्रीव विभीषण तथा अंगद के प्रति भी स्थापित रहा जो वनवास के बाद भी अयोध्या लौटने तक कायम रहा. उसी प्रकार निषादराज को भी बाल सखा जैसा सम्मान राजा राम द्वारा दिया गया था.

सेवक-भाव- राम प्रसंग में हनुमान जी का सेवक भाव मानव जीव के लिए अकल्पनीय, अतुलनीय, अविस्मरणीय, अवर्णणीय, अविश्वसनीय ओर दुर्लभतम है. श्री हनुमान जी का सेवा भाव की पराकाष्ठा का प्रतीक है. राम नाम के भजन मात्र से हनुमान जी अमर तत्व कहे जाते हैं. रामकाज करिबे को आतुर जैसे अतुल भाव से समाज की भलाई के कार्य करते चले जायें तो जीवन सफल हो जाएगा यह पाठ श्री हनुमान जी ही सिखाते है.

विवेकवान का भाव- श्री राम की लंका पति रावण को हनुमान के साथ साथ अंगद और विभीषण के माध्यम से कई चेतावनी देकर सचेत होने के व विवेक का पालन करने पर्याप्त अवसर दिए गए हैं कि जीवन के नैतिक तथा सात्विक नियमों का पालन कर भी सफल जीवन जिया जा सकता है.

रण कौशल- युद्ध रणनीति में निरंतर परिवर्तन करते रहना इस बात का परिचय करके बलशाली होने पर भी मस्तिष्क के समुचित प्रयोग से आक्रमण को धार देनी रहना चाहिए. युद्ध में कौशल के साथ साथ दल पर विश्वास भी नेतृत्व का परचायक है. लक्ष्मण, अंगद, सुग्रीव, नल-नील, जामवंत, विभीषण, द्विविद, केसरी, शतबली जैसे बलशाली शूरवीर और कूटनीतिकारों के कारण ही यह युद्ध दस दिनों में जीत लिया गया.

धरतीपुत्र भाव- आम और विशिष्ट के प्रति सम-भाव के वाहक श्री राम वृद्धा शबरी के द्वार पहुंचे और भोजन भी किया. अनुग्रह के हामी, अयोध्या के राजा श्री राम धरतीपुत्र की भांति सदैव प्रस्तुत होते है. वह संस्कार पालन को सदैव तत्पर रहे. इसी प्रकार अहिल्या देवी के साथ श्राप निवारण को उपस्थित हो कल्याण किया. तात्पर्य यह है कि सहायता को सदैव उपलब्ध रहे चाहे रक्षा का प्रश्न हो या वचन पालन हो या आग्रह पालन और इस प्रकार कर्म और अकर्म के पालन को राम सदैव प्रस्तुत रहे. इन्हीं संस्कारों के कारण वे मर्यादा पुरषोत्तम राम भी कहलाये.

पत्नी रक्षा भाव-पत्नी के प्रति आपने नैतिक कर्तव्यों के पालन ओर अर्धांगिनी की रक्षा को श्री राम सदैव प्रस्तुत हुए और पत्नी रक्षा हेतु सहायता भी मांगी. नए मित्र बनाये, समुद्र देव को ललकारा, शिव पूजन किया, पुल निर्माण के बाद युद्ध की ललकार के पूर्व समझौता दूत भी अग्रणी किया. युद्ध में किसी पक्ष को परास्त करने में परवाह नहीं की.

त्याग भाव – युद्ध के प्रतिफल या बाय प्रोडक्ट के रूप में पूरी श्रीलंका विजित की श्री राम ने और लंका जैसे पूर्ण विकसित देश का विलय अयोध्या में संभव भी था. हुआ क्या? श्री राम ने अपने युद्ध में श्री लंका का संभावित अधिपत्य त्यागकर समस्त उत्तरदायित्व आपने युद्ध काल के मित्र विभीषण को दे दिया जो श्री लंका के ही मूल नागरिक थे. भूमि का ऐसा त्याग प्रति के अनागिकाल से आज दिनक तक कहीं दोबारा नहीं दिखता है.
वचनबद्धता
पिता के देवलोक गमन का समाचार प्राप्त होने पर भी श्रीराम अपने वचन भंग न करके वचन का मान रख कर 14 बरस वनवास भोगा ओर अनुज भरत की अनुनय विनय के बाद भी अपने पिता के वचनों की रक्षा की राम की प्रतिबद्धता ही उन्हें मर्यादा पालन के लिए पूजनीय के स्तर पर स्थापित करती है जो सत्य युग का प्रतीक सिद्ध होते हैं दशरथ के रघुकुल के संबंध में कही गई बात की प्राण जाय पर वचन न जाए किसी भी व्यक्ति कि साख के संबंध में ब्रह्मवाक्य से कम नहीं है सतयुग की कहीं और स्थापित बातें आज कलियुग में भी उतनी ही प्रासंगिक है.
जिद के पालक- जीवन भर श्रीराम सरल हृदय हो आज्ञापालक रहे जीत मानकर जीत की इच्छा पूरी करने को सदैव तत्पर रहें अन्यथा क्या मरीज की स्वर्ण माया से अयोध्या के राजकुमार ब्रह्मा के वशीभूत हो एक कथित स्वर्ण मृग के पीछे दौड़ पड़े. सन्देश यह है कि ज्ञानी भी कर्म के बंधन से बंधे हैं परन्तु जिद का पाठ रामायण की अनुपम सीख है.
लक्ष्मण रेखा- सतयुग में संस्कृति की स्थापना के लिए समाज के हर व्यक्ति के लिए उत्तम सीखें लक्ष्मण रेखा धन मोह लोभ मद क्रोध माया आदि में भी विवेक के द्वारा मानव अपनी सीमाओं के भीतर रहकर जीवन को सफल कर सकता है और वह सीमा रेखा लक्ष्मण रेखा है जिसका पालन हर व्यक्ति को स्वयं पहचान कर मानिका यह रामायण का संदेश है अन्यथा क्या माँ सीता जो घर में शिव बाण उठाकर रख देती थीं वे रावण का भ्रम रूप नहीं पहचान पाती और लक्ष्मण रेखा पार्कर स्वयं का अपहरण होने देती

धर्म पर विश्वास -अपहरण होने पर मां सीता पर अतिशय दुःख की स्थिति में भी रावण के अनुग्रह, निवेदन, धर्म की नाटक और श्री राम का कटा हुआ छद्म शीश प्रस्तुत करने के बाद भी मां सीता ने अपना धर्म ना त्यागा और अपने मन की सुद्रढ़ रक्षा की. समय की लीला देखिये कि महत्वपूर्ण परिस्थितियों में भी उन्हें कालजन्य सहायता प्राप्त होती रही जो विभीषण की पुत्री त्रिजटा, श्रीराम सेवक हनुमान से मिली.
कर्म प्रधान भाव -रामभक्त श्री हनुमान जी समुद्र को लांघने के लिए वायु यात्रा कर भारत भूमि से श्रीलंका भूमि तक पहुँच गए थे. अशोक वाटिका में विनाश के पीछे की कार्य-योजना श्रीराम की शक्ति के साथ राम सेना की संगठन शक्ति का आरंभिक प्रदर्शन भी था. उसके पश्चात् लंका दहन के पीछे का प्रयोजन इस उद्धेश्य की पूर्ति है जिससे श्री राम की सेवा की अपार शक्ति का मानसिक आघात रावण को मिला. यह किसी भी प्रकार से एक मार्केटिंग से कम न था जहाँ शक्ति प्रदर्शन के साथ साथ चेतावनी भी समय समय भी दी गयी थी.
भक्ति भाव- रामायण में विभीषण का श्रीराम के प्रति भक्ति भाव, श्री हनुमान का श्रीराम के प्रति भक्ति भाव एवं स्वयं श्रीराम का महादेव शिव-शंकर के प्रति भक्ति भाव अकल्पनीय है जो कर्म व ज्ञान भाव के स्तर पर ही भक्ति भाव को भी प्रस्तुत करता है.

कर्मफल छोड़ता नहीं – रावण के परिवार के लिए एक दुष्कर्म का फल पूरे परिवार को भोगना पड़ता है जो एक शिक्षा है कि कार्य का दुष्फल अविनाशी है जो मारक है. यही कर्म का सुफल मोक्षदायी है जो समाज के नैतिक नियमों का पालन का वाहक है. भगवत गीता का पाठ तो लगभग ५५०० वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण जी के द्वारा कहा गया जबकि कर्म का अमोघ सिद्धांत तो राम काल में ७००० वर्ष पूर्व ही स्थापित कर दिया गया था.
समग्र सार – सतयुग का यह जीवन वृतांत, वचनबद्धता, मायालोक में लक्ष्मण-रेखा पालन, त्याग का निश्चित व निर्विकार भाव और परिजनों की सुरक्षा का दायित्व पालन की स्थापना करता है. समाज में जीवन परिजन, मित्र, सेवक तथा दुश्मन के बिना असंभव है अतः कर्म पालन का पाठ करते चलो. रामकथा समाज के लिए सन्देश है जो अनुकरणीय ओर शुद्धता के जीवन का द्योतक है.

मात प्रेम -कहने को तो श्री राम कौशल्या पुत्र थे परंतु मां को कैकेयी एवं सुभद्रा के प्रति भी उनके अनुराग में कोई कमी कभी भी नहीं रही और वनवास की आज्ञा को भी उन्होंने मां का आशीर्वाद समझकर न केवल स्वीकार किया बल्कि पालन किया. वनवास उपरांत भी तीनों मातृ शक्ति को एक जैसा सम्मान भी दिया जो न केवल दुर्लभ है बल्कि अनुकरणीय भी है.

भातृ प्रेम-कहने को तो श्री राम के सगे भाई कोई न थे. परंतु पिता दशरथ के पुत्र भरत और लक्ष्मण-शत्रुघन के प्रति जो भातृ प्रेम प्रस्तुत किया गया है वह नए केवल उच्चतम कोटि का है बल्कि अतुलनीय भी है. भाई लक्ष्मण के घायल होने पर राम के विव्हल होने का दृश्य अकल्पनीय है जब वे कहते हैं कि मैं अपनी मां को जाकर क्या जवाब दूंगा कि युद्ध में लक्ष्मण की यह स्थिति हो गई. वनवास के प्रथम दौर में जब उन्हें भरत के मिलने आने का समाचार मिलता है तब वह धरती मां से कहते हैं कि राह में पड़े कांटे हटा लेना अन्यथा भरत के कोमल नंगे पैर घायल हो जायेंगे और वह इतना दुखी है कि उसे खून से रिसते पैरों का भान भी न होगा.

वीतराग -श्री राम का समाज में जो आचरण है वह वीतराग को प्रदर्शित करता है जिसमें ना भोग की आकांक्षा है और ना ही किसी वस्तु विशेष को पाने की आकांक्षा को भी रघुवंश के सभी सदस्य प्रस्तुत होते हैं. ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर के सम-भाव के प्रणेता हो मर्यादा का पालन करते हैं.

गिलहरी प्रयास -भारत से श्रीलंका के पहुंच मार्ग हेतु पुल निर्माण में सेना के सभी पक्षों के द्वारा सहयोग दिये जाने का उल्लेख है और इसी संदर्भ में गिलहरी प्रयास का जिक्र आता है जो इस महासमर में गिलहरी जैसे लघु जीव के द्वारा भी अपने तन पर रेत चिपका कर समंदर को सुखाने का प्रयास करती है जिसपर श्रीराम के द्वारा गिलहरी की भी प्रशंसा की जाती है. टीम वर्क का अद्भुत उदाहरण है रामायण.

राम राज्य -यह एक ऐसी अवधारणा है जिसमें राजा राम और आम व्यक्ति में कोई अन्तर नहीं है. अयोध्या के राजतंत्र में भी लोकतंत्र कायम है जिसमे सम-भाव से जीवन यापन के समुचित अवसर के साथ साथ राजा के न्याय की शुचिता और अन्याय का अभाव के मूल तत्वों से राम राज्य के सिद्धांत स्थापित हुए थे जो आज भी स्वीकार्य उदाहरण हैं. आज कलियुग में भी रामराज की कल्पना की जाती है जहाँ राज तंत्र की पारदर्शिता ओर त्याग की स्थापित परंपरा थी.

रामबाण-राम जैसे निर्मल हृदय में भी एक मजबूत सैनिक उपस्थित था जो युद्ध भावना और युद्ध कौशल में प्रवीण होने के साथ साथ राम के धनुष से छूटे, बाण के सही स्थान पर चोट करने के परिचायक थे. अब रामबाण शब्द का मुख्य संदर्भ औषधि के माध्यम से सटीक उपचार में अधिक होता है जो राम के नाम में समाज के विश्वास का ध्योतक है. रम से बड़ा है राम का नाम यह सिद्ध है.

कर्म प्रधान रूपांतरण- राजकुमार राम का राज्याभिषेक अगले दिन होना था जिस पर कैकेयी माँ के दो वरदान के फलस्वरूप राजा दशरथ राम को 14 बरस का वनवास देना पड़ा. राम ने इस आज्ञा को सहर्ष स्वीकार कर जब वे वापस अयोध्या लौटे तब तक वे मर्यादा पुरुषोत्तम हो चुके थे. यह कर्म प्रधान रूपांतरण अविश्वसनीय है जहाँ राम ने न केवल आपने कर्तव्यों का पालन अपितु अपने नैतिक दायित्वों का निर्वहन भी पूर्ण सत्यता और निष्ठा से प्रस्तुत किया. कर्म पालन से कलियुग में भी सतयुग संभव है.

प्राकृतिक न्याय के हामी -समाज में प्राकृतिक न्याय की परिभाषा गढ़ने का शासन स्तर पर प्रथम उदाहरण श्रीराम ने ही प्रस्तुत किया और इसीलिए रामराज्य की अवधारणा स्थापित हुई जहां हरेक की बात सुनी जाने के और यथोचित प्राकृतिक न्याय के कई उदाहरण प्राप्त होते हैं