February 23, 2024
प्रदेशमध्यप्रदेश

हारे हुए जीतू को ही क्यों मिली प्रदेश की कमान

भाजपा का चौंकाने वाला अंदाज अब कांग्रेस को भी पसंद आ गया है, ज्यादा समय नहीं हुआ जब कांग्रेस को भाजपा का हिंदुत्व कार्ड पसंद आ गया था और उसके हर नेता को आप मंदिर मंदिर जाते देख रहे थे फिर वो राहुल हों या मध्यप्रदेशा में कमलनाथ. चौंकाने वाले मामले में कांग्रेस ने पहला कदम यह उठाया कि मध्यप्रदेश में कमलनाथ को बाहर कर जीतू पटवारी को प्रदेश की कमान सौंप दी. कमलनाथ का बदला जाना तो दीवार पर लिखी हुई इबारत थी लेकिन हारे हुए जीतू को प्रदेश सोंप देने में थोड़ा चौंकाने वाली बात जरुर है और वह भी तब जबकि उनकी दावेदारी थी. दिल्ली में हमने देखा कि सोनिया के हाथों से आलाकमान वाली छड़ी राहुल तक इसलिए पहुंची क्योंकि उम्र का जिक्र बार बार हो रहा था लेकिन राहुल ने अनमने मन से कुछ समय संभाला और अब बुजुर्ग नेता खरगे को अध्यक्ष पद सौंप दिया यानी यह मान लिया गया कि कांग्रेस को संभालने के लिए अनुभवी व्यक्ति चाहिए भले उम्र ज्यादा ही क्यों न हो, यूं भी हमने मोतीलाल वोरा को कमर झुकाए अंत समय तक कांग्रेस कार्यालय में तिजोरी संभालते देखा ही है. ऐसे में दिल्ली वाला फॉर्मूला सही था तो होना यह चाहिए था कि दिग्विजय या उनके दौर के किसी खांटी कांग्रेसी को यह कमान दी जाती लेकिन राहुल ने शायद यह तय किया कि प्रदेश में युवा को बढ़ाया जाए और वे खरगे एंड कंपनी के नेतृत्व में आगे बढ़ें. चूंकि जीतू पटवारी को हरवाने में कांग्रेसियों का ही बड़ा हाथ रहा है इसलिए यह साफ है कि कितने कांग्रेसी उन्हें नापसंद करते हैं और जब यही नापसंदगी पूरे राज्य स्तर पर देखी जाएगी तो कांग्रेसी एकजुट होंगे या और बिखरेंगे. माना कि कमलनाथ के इस विधानसभा में इतना ज्यादा एकतरफा और गलत निर्णय रहे कि पार्टी की प्रदेश में नैया ही डूब गई लेकिन यदि नया अध्यक्ष बना ही रहे थे तो किसी ऐसे को आजमाया जाता जिसमें सबको साथ लेकर चल सकने की क्षमता हो और वह क्षमता कम से कम जीतू पटवारी में तो साफ खलती है.

पटवारी अपनी विधानसभा हारे, अपना बूथ हारे और अपना जिला तो बुरी तरह हारे इसके बावजूद यदि उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष पद परोस दिया गया है तो समझा जा सकता है कि चेहरों की किस कदर कमी से कांग्रेस जूझ रही है. दरअसल जीतू को लाया जाना बताता है कि कांग्रेस हाइकमान का उसी पुराने तरीके से लागू होता जाएगा और यह भी कि खरगे भले कीहने को अध्यक्ष हैं लेकिन प्रदेश बांटने का काम राहुल के ही जिम्मे रहने वाला है. संगठन की जिम्मेदारी अलग तरह की होती है और इसमें हाथ जोड़कर एक बार जीत जाने के बाद पांच साल जीतू बने रहने की सुविधा नहीं होती बल्कि सभी को साथ लेकर चलते चलते कई मुद्दों पर हार भी जाना होता है. जीतू का आना यह संकेत देता है कि कांग्रेस को हर राज्य में राहुल जैसा कोई चाहिए, यानी जो उनकी गुडबुक में हो, उनकी उम्र का हो और कमोबेश वैसा ही अंदाज रखता हो और इन खासियतों में आप चाहें तो एक अजीब किस्म के अक्खड़पन को भी शामिल कर लें. दिग्विजय को राज्य न सौंपने के पीछे का कारण यह बताया जा रहा है कि कमल नाथ और दिग्विजय, दोनों से ही राहुल नाराज थे कि उन्होंने कांग्रेस के बजाए अपने बेटों के लिए ज्यादा सोचा और यदि वाकई यह वजह है तो जायज नाराजी है, उस हालत में भी कोशिश यह होनी थी कि किसी ऐसे को कमान दे दी जाए जैसे भाजपा ने प्रदेश की कमान एक से दस तक की गिनती में नही लिए जा रहे मोहन यादव को सौंप दी गई. राहुल के प्रति समर्पित होने और पार्टी के प्रति समर्पित होने में से एक का चुनाव होना था और राहुल ने अपने लिए सेनापति चुन लिया. अब उन्हें कमान सौंप ही दी गई है तो उन पर भरोसा कर निर्णय लेने की छूट दी जानी चाहिए ताकि वे कोशिश तो कर सकें लेकिन इसमें भी शंका बनी हुई है क्योंकि जिन्होंने जीतू को चुना है वे खुद ही पार्टी अध्यक्ष को दरकिनार कर निर्णय ले रहे हैं तो क्या ही उम्मीद करें प्रदेश अध्यक्ष पद का मान रखा जा सकेगा.