February 23, 2024
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pranab Da की 34 डायरी से बनी शर्मिष्ठा की पुस्तक

प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा की किताब ‘प्रणब: माय फादर: अ डॉटर रिमेम्बर्स’ 11 दिसंबर को ही लांच हुई है और इसके किस्सों ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचानी शुरु कर दी है.दरअसल इसे शर्मिष्ठा की किताब कहना ही गलत होगा क्योंकि इसमें अधिकतर पन्ने प्रणब दा की उन डायरी से आए हैं जिन्हें शर्मिष्ठा को देते हुए उन्होंने चेतावनी दी थी कि ये डायरियां उनके न रहने के बाद ही खोली जाएं क्योंकि इनमें काफी सारी बातें ऐसी हैं जिन्हें एक लंबे दौर की राजनीति के हिसाब से विस्फोटक और संवेदनशील हैं. प्रणब मुखर्जी की जन्म-जयंती पर इंडिया इंटरनेशनल सेंटर नई दिल्ली में लोगों के बीच जब यह किताब लाई गई तभी यह उम्मीद तो थी कि प्रणब की डायरियों के 34 वॉल्यूम्स हलचल मचाने वाले हैं लेकिन इसके हर पन्ने पर कुछ धमाकेदार मिलेगा इसकी उम्मीद इतनी तो नहीं थी. बंगलादेश के एक छोटे से गाँव से आगे बढ़ते हुए राष्ट्रपति भवन तक पहुंचे प्रणरब की इस किताब से साफ होता है कि वे इंदिरा गांधी के समय तक तो बहुत ही सही नेतृत्व मानते थे और अपने आगे बढ़ने का श्रेय इंदिरा को ही देते थे लेकिन इंदिरा की मृत्यु के समय से ही उनके लिए हालात बदल गए. दरअसल उनकी डायरी से साफ होता है कि जब इंदिरा की आकस्मिक मृत्यु के बाद बात राजीव को प्रधानमंत्री पद देने की हुई तभी प्रणब इस बारे में थोड़े अलग विचार रखते थे लेकिन इस बात को कुछ नेताओं ने राजीव के सामने इस तरह पेश कर दिया कि प्रणब खुद पीएम बनने के लिए राजीव को यह पद देने के समर्थन में नहीं थे. चूंकि उस समय राजीव अपनी मां की हत्या से स्तब्ध थे और उसके तुरंत बाद दंगों की पृष्ठभूमि में वे प्रधानमंत्री बने थे इसलिए वे उन नेताओं की बात को सही मानते रहे और यही वजह थी कि राजीव और सोनिया उन पर कभी भी पूरी तरह विश्वास नहीं कर सके. प्रणब दा के अनुसार राजीव जिन सलाहकारों के हिसाब से चलते थे उनमें अरुण नेहरु के नेतृत्व में काफी सारे नासमझ से लोग थे और इनकी बातें सुनने के चलते प्रणब को राजीव राज ही नहीं उनके जाने के बाद सोनिया के नेतृत्व में भी काफी कुछ झेलना पड़ा. प्रणब की यह किताब राहुल गांधी को लेकर भी कुछ बातें सामने लाती है और इन सारी बातों का मूल यही है कि प्रणब राहुल को अपरिपक्व मानते थे. एक घटना का जिक्र यह भी है कि राहुल को प्रण्णब ने मंत्रिमंडल में शामिल होने की सलाह दी ताकि उन्हें अनुभव हो सके लेकिन उनकी राय को सिरे से खारिज कर दिया गया और यहां राहुल के सलाहकारों की मुख्य भूमिका थी. राहुल से जुड़ा एक और किस्सा भी किताब में नत्थी है और वह यह कि प्रणब दा एक दिन सुबह जब पूजा में व्यस्त थे तभी अचानक राहुल वहां पहुंच गए. प्रणब के लिए यह अचरज और असमंजस की बात थी क्योंकि राहुल से उनका मिलने का समय शाम का तय हुआ था और सुबह अपनी पूजा में प्रणब कोई दखल बर्दाश्त नहीं करते थे.बाद में पता चला कि राहुल के ऑफिस वालों को एएम और पीएम में ही फर्क नहीं पता था और इसीलिए जो समय शाम का था उसी समय राहुल सुबह ही प्रणब के पास पहुंच गए थे. यदि आप राजनीति के अंर्तसंबंधों और पिछले पांच दशक से ज्यादा की राजनीतिक घटनाओं में रुचि रखते हैं तो प्रणब दा की इन डायरियों के ये अंश आपके लिए काफी रोचक हो सकते हैं और इनसे अपको कई घटनाक्रमों की वो असलियत भी सामने आते दिखेगी जो अब तक अलग तरीके से पेश की गई या सामने ही नहीं आ सकी.