May 27, 2024
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सत्तर घंटे काम करने वालों से भी पूछें

नारायणमूर्ति यानी इंफोसिस वाले, जिन्होंने अपने दोस्तों के साथ दस दस हजार मिलाकर अरबों की कंपनी खड़ी कर दी ब्रिेटेन में भले उन्हें कुछ लोग पीएम के सुसर की तरह पहचानते हों लेकिन यहां भारत में तो सुधा मूर्ति और उनकी जोड़ी मानवीय क्षमताओं और उदारता के मद्देनजर ही पहचानी जाती है. पिछले दिनों उन्होंने कह दिया कि यदि चीन को पीछे छोड़ना है तो हमारे युवाओं को प्रति सप्ताह 70 घंटे काम करना होगा, इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन की बात मानें तो अभी यह दर प्रति कर्मचारी 47.7 घंटे प्रति सप्ताह है यानी अभी मूर्ति साहब के हिसाब से हम बहुत कम काम कर रहे हैं. निश्चित ही उनकी बात में दम हो सकता है लेकिन सवाल यह है कि क्या हर महीने लगभग तीन सौ घंटे काम करना स्वास्थ्य के लिहाज से उचित है? यह सवाल भी थोड़ी देर से तब उठता है जब हम यह मान लेते हैं कि वाकई हमें चीन को पीछे छोड़ना है.नारायणमूर्ति जैसे व्यक्तित्व से आप किसी को पीछे छोड़ने वाली बात की उम्मीद नहीं करते. उनसे आप आगे बढ़ने की बात करने की उम्मीद तो करते हैं लेकिन इसमें किसी को पीछे छोड़ने की बात शामिल नहीं है. इधर इस पर बहस चल ही रही थी कि एक मैकिंसे का सर्वे आ गया जिसमें बताया गया है कि अपने वर्क कल्चर के लिए पहचाने जाने वाले जापान में वर्क सेटिस्फेक्शन यानी काम से संतुष्टि का हाल बेहद बुरा है. इस मामले में जापान भारत से लगभग तीन गुना पीछे है यहां तक कि काम करने की स्थितियों के बदतर माने जाने वाले चीन का भी दर्जा इस मामले में काफी बेहतर है. जॉब बदल पाने, काम में एकरसता और अब शार्ट टर्म पर रखे जाने वाले कर्मचारियों यह असंतोष कुछ ज्यादा ही है. ऐसे में नारायणमूर्ति साहब जिन सत्तर घंटे प्रति सप्ताह की दर से युवाओं से काम करने की उम्मीद लगाए बैठे हैं उनकी बाकी स्थितियां भी देखनी होंगी. जापान और चीन हमारे वर्क कल्चर की नीति तय करने में यह बताने में तो सहायक हो ही सकते हैं कि हमें क्या नहीं करना चाहिए. जिन्होंने सिर्फ काम पर ध्यान दिया उन देशों ने दूसरे मामलों में काफी कुछ खाेया है और यह कमी उन्हें अब पता चल रही हैं. हो सकता है युवा खुद को झोंक दें और हम चीन सहित पूरी दुनिया को काम के मामले में पीछे छोड़ने में सफल भी हो जाएं लेकिन उसके चलते जो दूसरे नुकसान होना तय हैं उनको झेलने के लिए हम कितने तैयार हैं.