May 27, 2024
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राहुल का वीडियो और पत्रकारिता के सबक

राहुल गांधी अब इंटरव्यू लेने लगे हैं और रवीश बाबू दुखी हैं कि एक व्यस्त राजनेता को आखिर पत्रकार क्यों बनना पड़ा. संभव है रवीश बाबू का दुख यह हो कि पत्रकारिता के आखिरी चरण में उन्हें यूट़यूब पर आना पड़ गया है और यदि राहुल बाबा ने पत्रकारिता शुरु कर दी तो वीडियो देखने वाले राहुल की तरफ न चले जाएं. राहुल ने सतपाल मलि का जो इंटरव्यू लिया है उसके राजनीतिक विश्लेषण तो काफी आ चुके हैं लेकिन इसके कुछ पहलू ऐसे हैं जो इक्का दुक्का जगह ही दिखे हैं. खासतौर पर बतौर पत्रकार आप को क्या नहीं करना चाहिए यह जरुर इस वीडियो से सीखा जाना चाहिए. 

शुरुआत होती है कि सतपाल मलिक कमरे में घुस रहे हैं और राहुल उनके पीछे हैं. उसके बाद सतपाल सोफे पर जम जाते हैं और राहुल आकर उनसे हाथ मिलाकर शुरुआत करते हैं. होस्ट पहले से मौजूद नहीं है, गेस्ट खुद आकर बैठ जाते हैं और फिर आकर होस्ट उन्हें ग्रीट करता है. राहुल सतपाल के पीछे दिख चुके होते हैं यानी इंट्री ले चुके हैं इस तरह उनकी दो इंट्री होती हैं और दोनों ही बेहूदे तरीके से की गई इंट्री हैं. 

बात की शुरुआत होती है और राहुल प्रश्न पूछना शुरु करते हैं लेकिन उससे पहले राहुल के पोश्चर को देखिए, वो सतपाल मलिक की तरफ अपने जूते किए हुए हैं उनका एक पैर दूसरे के ऊपर रखा हुआ है. सतपाल की जगह कोई भी खुद्दार व्यक्ति हो तो इंटरव्यू देने से इस बात पर ही मना कर सकता है कि इंटरव्यू लेने वाले को इतनी भी समझ नहीं है. पहला प्रश्न आता है कि आप राजनीति में कब से हैं, हद है. एक पत्रकार से उम्मीद की जाती है कि जिसका इंटरव्यू लिया जा रहा है उसके बारे में उसे मुख्य बिंदु तो पता ही होंगे. यहां सवाल यह बनता था कि आप तो फलां सन से राजनीति में हैं लेकिन हम जानना चाहते हैं आप राजनीति में आना कैसे हुआ या आपके राजनीतिक जीवन की शुरुआत कैसे हुई?(उत्तर में भी लोचा था और वह यह कि राज्यपाल रहते हुए आप खुद को सक्रिय राजनीति का हिस्सा नहीं बता सकते यानी सतपाल ने उस हिस्से को भी राजनीति में शाल बताया जब वे राज्यपाल थे यानी संवैधानिक पद पर थे. )

इस सवाल के जवाब में सतपाल नाम लेते हैं चौधरी चरणसिंह का और राहुल बीच में रोक कर अजीब से अंदाज में पूछते हैं कैसे थे चरणसिंह. पत्रकारिता के छात्र समझें कि यह ऐसा सवाल बकवास समझा जाता है क्योंकि आप विषयांतर कर रहे हैं. खैर जैसे तैसे बात आगे बढ़ती है और राहुल पुलवामा पर सवाल पूछते हैं. अप्रत्याशित तौर पर सतपाल कहते हैं कि यह तो नहीं कह सकते कि यह इन्होंने (भाजपा) करवाया लेकिन इसका राजनीतिक फायदा जरुर उठाया यदि यहां कोई भी अच्छा पत्रकार हो तो वह यह जरुर पूछता कि क्या इसमें राज्यपाल की भूमिका कहीं नहीं थी क्योंकि सतपाल कह रहे थे कि मुझे पता था 12 दिन से विस्फोटक से लदी गाड़ी घूम रही है. एक अच्छा पत्रकार तुरंत इस बात को लपक लेता और सतपाल से कुछ कठिन सवाल जरुर पूछता लेकिन न ऐसा इस स्क्रिपटेड इंटरव्यू में राहुल को कुछ करना और न उन्होंने किया. फिर सवाल आता है कि कुछ लोग ऐसा करते हैं कि बस मुझे तो बनना ही है, इस सवाल में से मूल बात ही गायब थी कि वे क्या बनने की बात कर रहे हैं लेकिन सतपाल जवाब देते हैं और यह एक बार भी नहीं कहते कि इस जिद की नींव नेहरु के समय में पड़ी थी जिसे इंदिरा ने भी जीवित रखा. इस इंटरव्यू को उन्हें जरुर देखना चाहिए जो समझना चाहते हैं कि क्या नहीं किया जाना चाहिए एक पत्रकार या एक इंटरव्यूअर के तौर पर. मजे की बात यह है कि इतने सारे तथ्यों के बाद भी इस मुलाकात की सबसे बड़ी कमजोरी तो अब तक बताई ही नहीं गई. दरअसल इंटरव्यू उस व्यक्ति का होना चाहिए जो किसी भी तरह से मौजूं हो, जिसका कद हो और जिसका इंटरव्यू आज करने का कोई कारण हो. सतपाल मलिक आज किसी पैरामीटर पर फिट नहीं हैं. यह तो राजनीतिक विश्लेषक बता ही चुके हैं कि राहुल ने सतपाल को मनचाही मुराद दे दी लेकिन खुद अपना कद राजनीतिक तौर पर घटा लिया.